आप एक कर्ज़ अर्थव्यवस्था में जी रहे हैं
दुनिया अब एक एक्सेल शीट बन चुकी है, जो सिर्फ IOUs (कर्ज़ की रसीदें) से भरी हुई है।
अमेरिका पर $34 ट्रिलियन का कर्ज़ है, चीन पर $17.5 ट्रिलियन और भारत पर ₹2.05 ट्रिलियन।
इसका मतलब है कि आपके टैक्स का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में जा रहा है।
भारत की कमाई का हर चौथा रुपया कर्ज़ चुकाने में लग रहा है।
डरावना सच
दुनिया की 70% GDP अब कर्ज़ है।
जैसे ₹1 लाख कमाना और ₹70,000 दस लोगों को देना।
वैश्विक अर्थव्यवस्था अब आगे नहीं बढ़ रही, बल्कि सिर्फ री-फाइनेंसिंग
ऐसा क्यों हो रहा है?
क्योंकि कर्ज़ से विकास तेजी से होता है, जितना बचत से कभी नहीं हो सकता।
सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए उधार लेती हैं, कंपनियां शेयर बढ़ाने के लिए और आम आदमी महंगाई से लड़ने के लिए।
अब ये सिर्फ पर्सनल फाइनेंस नहीं रहा
हर भारतीय घर ₹1.7 लाख का अप्रत्यक्ष वैश्विक कर्ज़ ढो रहा है।
भले ही आप बैंक के कर्ज़दार ना हों, लेकिन आपकी नौकरी, ईंधन, किराया और रिटायरमेंट फंड ज़रूर हैं।
यह एक साइलेंट प्रेशर है जो हर दिन बढ़ रहा है।
मुख्य खतरा
कर्ज़ सिर्फ बढ़ नहीं रहा है, वो कंपाउंड
वैश्विक ब्याज भुगतान $10 ट्रिलियन पार कर चुके हैं — जो भारत की GDP से दोगुना है।
यह अब कर्ज़ चक्र नहीं बल्कि कर्ज़ भंवर
तो फिर दुनिया अभी तक चल कैसे रही है?
जवाब: रोलिंग डेब्ट — हम कर्ज़ चुकाते नहीं, बस नया कर्ज़ लेकर पुराने को चुकाते हैं।
और अगर ये लूप टूट गया?
तो डिफॉल्ट्स (कर्ज़ ना चुकाने की घटनाएं) शुरू होंगी।
2020 से अब तक वैश्विक कर्ज़ $65 ट्रिलियन बढ़ा है, लेकिन दौलत सिर्फ $20 ट्रिलियन बढ़ी।
यानि हर ₹100 की दौलत के लिए दुनिया ने ₹325 उधार लिया।
ये दौलत नहीं है — ये फाइनेंशियल स्टेरॉइड्स हैं।
नई सच्चाई:
- बैंक पुराने लोन चुकाने के लिए नया लोन देते हैं
- कंपनियां कर्ज़ से अपने शेयर खरीदती हैं
- लोग दूध खरीदने के लिए क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते हैं
ये महंगाई नहीं है, ये उधार लिए हुए समय की कीमत है।
2008 बनाम 2025
2008 में संकट कर्ज़ से शुरू हुआ था।
2025 में कर्ज़ ही सिस्टम बन चुका है।
अब आप कर्ज़ बबल में नहीं...
...बल्कि एक कर्ज़ आधारित अर्थव्यवस्था में रह रहे हैं।
डेट मशीन अब धीमी नहीं हो रही
वो और तेज़ हो रही है।
2025 में कुल वैश्विक कर्ज़: $320 ट्रिलियन
- सरकारों का कर्ज़: $90T
- कंपनियों का कर्ज़: $160T
- घरों का कर्ज़: $70T
ये सब आपस में बैंकों, फंड्स और एक-दूसरे के ऋणी हैं।
यह एक आर्थिक बम है — और इसकी टिक-टिक जारी है।

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