बंधन बैंक की कहानी: जब सावधानी विजयी होती है
बंधन बैंक ने 2001 में एक माइक्रोफाइनेंस संस्था के रूप में शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य भारत के अनबैंक्ड लोगों को सेवाएं देना था। 2015 तक यह एक यूनिवर्सल बैंक बन गया। कागज पर यह यात्रा तेज़ विकास, वित्तीय समावेशन और उपेक्षित बाजारों को सेवा देने की दिशा में शानदार थी। लेकिन एक विशेष बिजनेस मॉडल को बड़े पैमाने पर ले जाना केवल महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि संयम का भी मामला है।
बंधन की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इसका बड़ा हिस्सा असुरक्षित माइक्रोलोन पर आधारित था, खासकर पूर्वी भारत के राज्यों में। ये क्षेत्र राजनीतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय अस्थिरताओं के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। 2020–2021 के दौरान, पश्चिम बंगाल और असम में विरोध प्रदर्शन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण बैंक की परिसंपत्ति गुणवत्ता पर भारी असर पड़ा।
आज भी, विविधता लाने के प्रयासों के बावजूद, बैंक की 30% से अधिक बुक माइक्रोफाइनेंस में है और इसका NPA अनुपात अन्य बैंकों की तुलना में अधिक बना हुआ है।
मुख्य संदेश:
तेज़ वृद्धि हमेशा जोखिम का समाधान नहीं होती — कई बार यह जोखिम को बढ़ा देती है।
- 📌 बंधन का मॉडल एक सीमित भौगोलिक और उधारकर्ता प्रोफाइल पर आधारित था, जिससे जोखिम बढ़ा।
- 📌 बैंक ने IPO के बाद माइक्रोलोन पोर्टफोलियो को तेजी से बढ़ाया, लेकिन उसके अनुपात में सुरक्षा कवच नहीं बनाया।
- 📌 नियामकीय दबाव के कारण प्रमोटर हिस्सेदारी घटानी पड़ी, जिससे विकास पर असर पड़ा।
- 📌 हाल ही में बैंक किफायती हाउसिंग, SME लोन और भौगोलिक विविधता की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया है।
बंधन हमें यह सिखाता है कि बैंकिंग केवल पहुंच के बारे में नहीं है, बल्कि संतुलित पहुंच के बारे में है। जोखिम का पता हमेशा शुरू में नहीं चलता — जब चीजें गलत होती हैं, तब वह सामने आता है।
वित्तीय दुनिया में, डिज़ाइन में लचीलापन केवल संख्या में नहीं होता — यह इस बात में है कि आप कैसे बढ़ते हैं। विकास की गति से ज़्यादा जरूरी है, विकास का तरीका।

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