जापान में ‘ट्विटर किलर’ को फांसी – दोषी पर 9 लोगों कत्ल का आरोप


टोक्यो। जापान में सोशल मीडिया पर आत्महत्या का भरोसा दिलाकर नौ लोगों की हत्या कर देने वाले तक़ाहिरो शिराइशी नामक शख्स को शुक्रवार को फांसी दी गई। यह देश में 2022 के बाद राजधानी सज़ा (Death Penalty) का पहला मामला है ।

🔍 घटना का सार

शिराइशी (34 वर्ष) ने 2017 में ट्विटर (अब X) पर मानसिक तनाव से जूझने वाली नौ पीड़ितों—आठ महिलाएँ और एक पुरुष—का कत्ल किया और शवों के टुकड़े अपने ज़ामा (कनागावा प्रान्त) स्थित छोटे अपार्टमेंट में फ्रीज़र और कलर कूलर में छुपा दिए ।

पीड़ितों का उम्र 15 से 26 वर्ष के बीच था, इनमें तीन किशोरियाँ शामिल थीं ।

शिराइशी ने पीड़ितों से कहा कि वह उनकी “आखिरी इच्छा” पूरी कर देगा, लेकिन असलियत में उन्हें रैप कर गला घोंटकर मारा ।


🚨 बचाव और सुनवाई

बचाव पक्ष ने कहा कि पीड़ितों की सहमति से हत्या हुई क्योंकि वे आत्महत्या पर विचार कर रही थीं, लेकिन अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह बेहद “कपटी और निर्दयी” था ।

दिसंबर 2020 में उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई, जिसे अदालत और उच्च न्यायालय में चुनौती देने के बाद जनवरी 2021 में अंतिम रूप मिला ।


⚖️ शिराइशी की फांसी और कानूनी प्रक्रिया

न्याय मंत्री केइसुके सुज़ुकी ने इसे “स्वार्थी, समाज में भय और अशांति मचाने वाला अपराध” बताते हुए फांसी की मंज़ूरी दी ।

यह फांसी टोक्यो डिटेंशन हाउस में चुपचाप लटकाया गया, और पूरी दुनिया को मौत की घोषणा के बाद सूचित किया गया ।

जापान में फांसी अक्सर सुनाई अवधि के कई साल बाद और गुप्त रूप से की जाती है; कैदियों को आमतौर पर कुछ घंटे पहले ही इसकी सूचना दी जाती है ।

शिराइशी की फांसी से पहले जापान में सबसे आखिरी फांसी जुलाई 2022 में हुई थी ।


🌍 वैश्विक और सामाजिक प्रभाव

इस मामले ने जापान में आत्महत्या की प्रवृत्ति, सोशल मीडिया जिम्मेदारी और मौत की सज़ा पर नई बहस शुरू कर दी है ।

जापान और अमेरिका, G7 देशों में, अदालती प्रक्रिया जारी रखने के बावजूद ही मृत्यु-दण्ड रखते हैं । इंसानियत विरोधी सज़ा के रूप में यूरोपीय संघ ने भी आलोचना की है ।

यह मामला दिखाता है कि कैसे सोशल मीडिया पर कमजोर मनोस्थिति वाले लोग खतरनाक व्यक्तियों के झांसे में आ सकते हैं और साथ ही यह मौत की सज़ा, मानवाधिकार, न्याय व्यवस्था और आत्महत्या रोकथाम दृष्टिकोण पर एक महत्वपूर्ण सामाजिक–कानूनी बहस को जन्म देता है।

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